========
1-
कुहासों की गलियों में से गुज़रते हुए जीवन की गठरी न जाने कितनी बार नीचे गिरी, कितनी बार खुली, कितनी बार बिखरी और समेटी गई लेकिन गठरी की गाँठ बड़ी कमज़ोर रही फिर चिंदी बनकर उड़ने से उसमें भरी स्मृतियों को उड़ने से कोई नहीं रोक पाया | उसे लगता है सबके जीवन की गठरी कुछ ऐसी ही होती है, कुछ ऐसा ही अनुभव पसारती, समेटती, बटोरती है | वह अनोखी नहीं ! हाँ ! किसी की गठरी बड़ी, तो किसी की छोटी ! किसी की पूरी तरह से सिमटी हुई तो किसी की बिखर जाने के बाद सिमटती ही नहीं | क्या कर लेगा इंसान ? अपने सिर पर धरी गठरी संभालते हुए पूरी ज़िंदगी गुज़ार देता है वह ! गुज़ार क्या देता है गुज़ारनी पड़ती है | उसके हाथ में कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं !बस, शुक्रिया ही करना होता है ज़िंदगी को, जो कुछ भी उसने दिया उसके लिए और जो नहीं भी दिया, उसके लिए भी | हमें इस धरती पर जन्म दिया, अपने भीतर उपजा हुआ अन्न खिलाकर हमें इस योग्य बनाया कि हम अपनी परेशानियों का सामना कर सकें, ऊर्जा दी जिसके सहारे हम जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चल सकें—तो शुक्रिया ज़िंदगी, बस –शुक्रिया ज़िंदगी !!आनंद का शुक्रिया, जो टीसें हैं उनका भी शुक्रिया !!
इस उपन्यास की नायिका हमारी अनामिका यानि आना है | पिचहत्तर वर्ष की होने लगी थी अनामिका ! जीवन का सारा निचोड़ जैसे उसकी आँखों के भीनेपन में सिमटकर रहा गया था !यूँ कोई तकलीफ़देह जीवन नहीं जीया था उसने ! ऐसे ही जैसे आम मध्यवर्गीय लोगों का होता है | अब, उसे उच्च मध्यमवर्गीय कहा जाए या कुछ और ---यह वह नहीं जानती, इसका कोई पैमाना नहीं है उसके पास ! ज़िंदगी किस पल गुड़ सी मीठी हो जाए, कब नीम सी कड़वी, कहाँ पता होता है ?महसूस होता है बस मीठापन और कड़वाहट जो लंबे समय तक बनी रहती है | ऐसे ही चलता रहता है जीवन का तामझाम ----!!
आना यानि अनामिका के पति विवेक ने उसके जीवन को कभी कैद करके नहीं रखा, यद्यपि नानी माँ उसकी शादी तय होने पर कोई बहुत ख़ुश नहीं थीं | उन्हें लग रहा था जैसे उनकी एकमात्र बिटिया को शादी के बाद गाँव के वातावरण में काफ़ी तकलीफ़ें झेलनी पड़ीं थीं, उनकी धेवती को भी इतने बड़े परिवार की भट्टी में झौंका जा रहा था |
कहाँ --वह जाने कैसे मुश्किल से बची-खुची बिटिया !उसके जन्म से पहले अनामिका की माँ ने कई बच्चों को जन्म दिया था जो जीवित नहीं रह सके |स्वाभाविक था उसका लाड़-प्यार !भाई तो बहुत बाद में हुआ |वह कहता ही था कि सारा लाड़ तो आना दीदी को ही मिला यानि अनामिका ने पहले ही सबका प्यार लूट लिया, उसके हिसाब से तो सबकी झोली में भरा लाड़-दुलार तो आना दीदी पहले ही चट कर गई थीं| उसके हिस्से क्या आया –?खुरचन !!
“अरे ! खुरचन में ही तो असली स्वाद होता है –खुरचन तो तूने ही चाटी सारी –“आना भी उसे चिढ़ाने में पीछे रहने वाली नहीं थी जबकि उससे कितनी तो बड़ी थी |
“मैं बेचारा !----’ कोई न कोई बहाना लेकर हर दूसरे दिन वह राग अलापने लगता |
ऐसा थोड़े ही होता है, सभी बच्चे माता-पिता की आँखों के तारे होते हैं ! लेकिन यह भी सच है कि पहले बच्चे पर सबकी ही दृष्टि होती है | सात साल बाद परिवार में बेटा आया लेकिन तब तक आना दीदी पूरे घर की दीदी बन चुकी थीं |घर में सब उसे दीदी कहकर पुकारते | इतना कि कभी-कभी तो वह चिढ़ भी जाती कि नानी, माँ, पापा सब ही उसे दीदी क्यों कहते हैं ?जितना वह चिढ़ती, उतना ही उसे और चिढ़ाया जाता | वैसे आना दीदी का खूब शासन चलता अनुज पर ! बड़ी दीदी हैं तो बात तो माननी पड़ेगी न !
अब जो भी हो, किसीका भाग्य तो कोई बदल नहीं सकता ! उसका जीवन समाज के दिखावे के अनुसार बहुत ऐशोआराम में तो नहीं, अपने मन के अनुसार ज़रूर बीता था जो उसकी दृष्टि में ऐशोआराम से अधिक महत्वपूर्ण था |वैसे ऐशोआराम के लिए मनुष्य अपनी स्वयं की परिभाषा गढ़ लेता है| इसीलिए हर मनुष्य अपनी सोच के अनुसार जीता है, कोई दुखी रहता है तो कोई सुखी | कोई अनेकों सुख-सुविधाओं से लबालब है किन्तु दुखी है और कोई दो जोड़ी कपड़ों, पेट भर रोटी और छोटे से छप्पर के नीचे भी मस्त, आनंद में है | दरअसल, सब कुछ सोच पर निर्भर है, सब चीज़ें इंसान की मानसिकता से जुड़ी हुईं !
विवेक के साथ वह लगभग अड़तालीस वर्ष रही, उन्होंने कभी पत्नी की इच्छाओं को ताले में बंद करने की चेष्टा नहीं की, शायद उनके कभी दिमाग में भी नहीं आया | नानी का कहना था कि उत्तर-प्रदेश का दस भाई-बहनों वाला, मध्यम शिक्षित परिवार का लड़का है विवेक ---उसकी सोच तो चूल्हे –चक्की से अधिक आगे जाएगी ही नहीं | उनकी लाड़ली रोटी थेपते-थेपते लकड़ी हो जाएगी !लेकिन नानी की सोच गलत निकली और इतने बड़े परिवार में अनामिका को हाथों-हाथ लिया गया |
हाँ, परिवार बनाने के बाद तो सबको ज़िम्मेदारियाँ उठानी ही होती हैं, वो कौनसी आश्चर्यजनक या बड़ी बात है | आना यानि अनामिका अपने घर से तो कुछ भी बिना सीखे आई थी, एक कोरा कागज़ सी !सब उसे बिगड़ा हुआ कहते, भला लड़कियों को भी कोई ऐसे सिर पर चढ़ाता है!उसे देखकर लोग खुसर-फुसर करते | सच्ची ! कुछ न कुछ तो परेशानी होनी ही होती है लोगों को चाहे किसी का कोई मतलब हो या न हो ! और भले ही वह कुछ न सीखकर आई हो पर धीरे-धीरे ज़रूरत ने उसे सब सिखा दिया था, होता ही ऐसा, ज़रूरत सबको अपने आप ही सब कुछ सिखा देती है |
‘समय बड़ा बलवान, अच्छे अच्छों को बना दे पहलवान !’
आजकल न जाने क्यों और कैसे वह बीते हुए कल की गलियों में घूमने लगी है | शायद ऐसा होता है, एक उम्र के बाद इंसान अपने जीवन के पीले पत्ते पलटने लगता है | माँ जी यानि उसकी सास भी अपने जीवन के अंतिम दिनों में खूब बोलने लगी थीं और न जाने क्या-क्या बातें सुनाने लगीं थीं, जिनसे उसका कोई भी लेना-देना नहीं था |वह जानती ही नहीं थी किसी को भी, जिनके बारे में माँ जी बातें करती रहती थीं | जैसे खो जाती थीं वे दूर कहीं, जहाँ तक वह तो पहुँच क्या फटक भी नहीं पाती थी | उसके पास उनकी बात सुनने के अलावा कोई चारा भी नहीं होता था |
जीवन का ग्राफ़ बड़ा विचित्र है ! न कोई उसके बारे में जानता है, न ही जान सकता है | बस, अपने गुमान में यह सोचता है कि वह न जाने तोप है कि बंदूक ! किसी को भी, चाहे जैसे भी, कहीं भी, कैसे भी अपने रास्ते से हटा सकता है | लेकिन ऐसा नहीं है भाई ---ज़िंदगी तो इंसान को चने चबवा देती है | कभी ऊपर ग्राफ़ जाता है तो कभी इतना नीचे कि आँखें कितनी भी नीचे झुका लो, कुछ भी दिखाई नहीं देता | हाँ, एकसी कभी नहीं चली ज़िंदगी ! अगर चले तो उसका नाम ज़िंदगी ही कहाँ ?
कॉफ़ी का मग हाथ में लेकर आना झूले पर बैठी थी, आज उसे विवेक बड़ी शिद्दत से याद आ रहे थे | सर्दी के दिनों में अपने घर के फूलों वाले छोटे से बगीचे में दोनों पति-पत्नी कभी फलों की चाट का आनंद लेते, कभी उनके हाथों में कॉफ़ी के मग मुस्कुरा रहे होते | ताउम्र ज़िंदगी की पटरी पर एकसी दौड़ में भाग लेने के बाद अवकाश का समय ऐसा लगा मानो बस, अब ये समय केवल अपना है | अपने चाँद-सूरज, अपने हवा-पानी ! अपना समय और समय की डोर से जुड़े आनंदों की टोकरी ! जैसे रंग-बिरंगे फूल खिलखिला रहे हों ! वैसे होता नहीं है ऐसा क्योंकि हम भारतीय लोग आज भी बंधनों में बंधने में ही आनंद पाते हैं | पहले अपने बच्चे –फिर उनके बच्चे ! इन सबमें अपने स्वयं के लिए अवकाश के क्षण ढूँढने में हाथ में आए पलों को भी सरक जाने देते हैं हम !
सेवा-निवृत्ति के बाद कितने संस्थानों से नौकरी के लिए बुलाया गया था विवेक को --लेकिन --–दस साल तक तो अभी कुछ नहीं करना है | ‘स्लोगन’ उनके मुख से ऐसा निकला कि जब घर में बोर होने की बारी आई तब तक उनके स्तर की नौकरियाँ उनसे बाद वालों के हिस्से चली गईं थीं | लोग धीरे-धीरे उन्हें भूलने लगे थे| स्मृतियों की हवा में कचरा भरने लगा था | अवकाश के पहले से ही विवेक के पास अच्छे ऑफ़र्स आने लगे थे लेकिन उनका मन ही नहीं था |उन्होंने चाहा कि अभी कम से कम ज़िंदगी के दस वर्ष तो आराम करेंगे ही ! और दस वर्ष लंबे होते गए, द्रौपदी के चीर की भाँति ----उनकी अंतिम श्वांस तक वे दस वर्ष समाप्त ही नहीं हुए --!!
अनामिका को विवेक के बड़े से शष्ठिपूर्ति समारोह की याद हो आई |जिसमें उनकी बड़ी पोती की छटी का समारोह भी शामिल था |पोती की छटी और विवेक के षष्ठीपूर्ति समारोह ने विवेक के चेहरे पर एक सुकून भरी चमक भर दी थी | विवेक अपने बहुत से मित्रों और परिचितों को देखकर आश्चर्य में भर गए थे | एक मासूम बच्चे की खुशी से उनका चेहरा दप-दप करने लगा था और वह तृप्त हो गई थी | आना को सरप्राइज़ देने में बड़ा मज़ा आता | कितनी बार तो पति के जन्मदिन पर वह संबंधियों, मित्रों को इक्कठा कर लेती जिनमें विवेक के क़रीबी मित्र तो होते ही !
ये जन्मदिवस किसी होटल में रखा जाता जिसकी विवेक को कानोकान खबर न होती और उन्हें बहला-फुसलाकर ले जाया जाता |इस प्रकार के विशेष दिनों में सुबह घर में यज्ञ की परंपरा थी सो उस दिन सुबह से ही विवेक अपने को ‘स्पेशल’ ट्रीटमेंट देने लगते|और पार्टी से लौटकर तो कमाल ही हो जाता | गाड़ी में भरकर आए हुए गिफ़्ट्स को वो एक बच्चे की भाँति जब तक एक-एक ‘अनरैप’ न कर लेते, उन्हें नींद ही न आती | चाहे कितना ही समय हो जाए, चाहे कितनी भी नींद आ रही हो, गिफ़्ट्स रात को ही देखने ज़रूरी होते थे फिर समेटने में आना की नानी याद आती लेकिन विवेक अपने गिफ़्ट्स से बच्चे की तरह आनंदित हो, तृप्त मुस्कान ओढ़कर चन्द मिनटों में खर्राटों की दुनिया में विचरण करने लगते |